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Sufinama
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अज्ञात

अज्ञात के दोहे

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हद हद कर के सब गए बे-हद गया न कोय

अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय

सीख वाही को दीजे जा कों सीख सोहाय

सीख न दीजे बांदारा घर बनिए का जाये

नेह सगा सोई सगा हाड़ सगा नहीं होय

माँ बैठी त्रिया जरे अचरज जग कों होय

दर-दीवार दर्पण भए जित देखूँ तित तूए

काँकर-पाथर ठीकरी भए आरसी मोए

सात स्वर्ग अपवर्ग-सुख धरै तुला इक अंग

तुलै न ताहि सकल मिले जो सुख लो सतसंग

तुलसी आह गरीब की कभू न खाई जाए

मरे चाम की साँस से सार भसम होह जाए

तन उजरो मन कोएला बगुले का सा भेस

तो सें तो कागा भल्लू बाहर भीतर एक

साजन तोरे दरशन को तरसत हूँ दिन-रैन

तारे गिनती रहत हूँ पलक लगे ना नैन

आग लगी है बृक्ष को जलने लागे पात

तू क्यूँ जरे है पंखिया पँख हैं तेरे साथ

फल खाए उस बृक्ष के गंदे कंहे पात

अब है मेरा धर्म ये जर जाऊँ ईहे साथ

तुलसी अस्मय के सखा धीरज धर्म बिवैक

साहस शील उदारता राम भरोसे एक

जो मैं ऐसा जानती कि प्रीत किए दुख होय

नगर ढंडोरा पीटती कि प्रीत न करियो कोय

तुलसी आह गरीब की कभू न खाली जाए

मिरे चाम की साँस से सार भसम हो जाए

राम-राम सब कोई कहै ठग ठाकुर और चोर

बिना प्रेम रीझे नहीं तुलसी नँनद किशोर

जा घट प्रेम न संचरै सो घट जान मसान

जैसे खाल लोहार की साँस लेत बिन प्रान

छुटी न ससुता की झलक झलकियो जोबन अंग

द्वैत देह दो हुन मिले देत ताफ़ता रंग

बाँह छुड़ाए जात हो सुनिबल जान के मोय

हृदय में से जाओगे तो मर्द बंदूगी तोय

रहिमन धागा प्रेम का जिन तोड़ौ झटकाय

टूटे से फिर ना जुरै जुरै गाँठ पड़ जाय

टुकड़े-टुकड़े देह हों तन से निकले प्राण

तब हों मुख त्यागो नहीं पिया नाम की तान

अपनी गरजन बोलियत कहा निहोरे तोय

तू प्यारा मो जीव का मो जीव प्यारा मोय

दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय

सुख में जो सुमिरन करें दुख काहे को होय

अपनी प्रभुता को सबै बोलत झूट बनाए

वेश्या बरस घटा वही योगी बरस बढ़ाए

उज्जल बरन अधीम-गत एक चरण दुइ ध्यान

मैं जानूँ कोई भगत है पर निपट-कपट की खान

जो वा के तन की दसा देख्यौ चाहत आप

तो वली नैक बिलौ कियै चली आओ चुप-चाप

चाकी-चाकी सब कहें मानी कहे न कोय

मानी से जो लग रहा बाल न बेका होय

साईं सकारै जाएँगे सो नैन मरेंगे रोय

बिधना ऐसी रैन कर कि भोर कभू न होय

छोटी-मोटी कामिनी सब-ही बिष की बेल

बैरी मारै दाँव दै यह मारे हँसी-खेल

बेचूँ खोटे दाम सों मिटै जीव की हान

बलिहारी सोना कीजिए जासौं टूटे कान

अरे पपीहा बावरे आधी रैन जिन कूक

धीरे धीरे सुलगती सो तू ने दीनी फूँक

वारिस दाता आन बचाओ नय्या पड़ी मंजधार

साईं आपन दया करौ के लागे बेड़ा पार

आलस नींद किसाने खोबै चोरै खोबै खाँसी

हंसी-मस्ख़री साधै खोबै बृहन खोबै दासी

मीन काट जल धोईए खाए अधिक पियास

रहिमन पीत सराहिए मूए मीत की आस

बुरे लगत सिख के बचन हिये बिचारो आप

करवी भेषज बिन पिए मिटै न तन की ताप

आ जा प्यारे नैन में पलक ढाँप तोय लूँ

ना मैं देखूँ और को ना तो कों देखन दूँ

धजा फरकती समर मां बाजे अनहद नूर

यक्ता है मैदान मां पहुँचेगा कोई सूर

काँट भयउ तन सूख के पर है कोई श्वास

अरे दई ले चल अभी जहाँ पिया का बास

हों साजन जानत नहीं पिया बिछुड़न की सार

जिया बिछुड़न से है कठिन पिया बिछुड़न की बार

अमी हलाहल मध-भरे सुवेत श्याम रतनार

जियत-मरत झुक-झुक परत जिह चित इक बार

कागा नैन निकास दूँ सो पिया पास ले जाय

पहले दरश दिखाय के पाछे लीजियो खाय

सदा भूम गोपाल की जा में अटक कहा

जा के मन में अटक है सोई अटक रहा

तुलसी जो तुम कहत ते संगत ही गुन होय

माँझ ओखारी रमसरा रस काहै नहिं होय

واسکھ ماتھے سل پڑے جن سکھ ہر بسرائے

واسکھ سین پہچیا بھلی جو رام کہت دن جائے

آوت ہی ہر شے نہیں نین نہیں سنیھ

تلسی تہاں نہ جائے کنچن برسے مینھ

چھن چڑے چھن اوترے سو تو پریم نہ ہوئے

آٹھ پہر لاگیو رہے پریم کہاوے سوئے

چندن پرو چمار کیں نت اٹھ چیرت چام

کہوہ چندن کیسی بھئی؟ پرو نیچ سے کام؟

چونچ تہاری کاٹ کے تاپے چھر کوں نون!

پیا میرے میں پیو کی توپی کہے سو کؤن ؟

بیر سرا ہیں بیرتا جتی جیستاجان

رحمن سانچے سور کو بیری کرت بکھان

کنک کنک تیں سو گونی ماد کتا ادھیکائے

اوئے کھائے بورائے جگ یہ پائے بورائے

جو تو آیا جگت میں جگت سرا ہے توئے

ایسی کرنی کر چلو پا چھے ہنسی نہ ہوئے

کبیر آپ ٹھگائے اور نہ ٹھگئے کوئے

آپ ٹھگے سکھ اوپجے اور ٹھگے دکھ ہوئے

ماٹی کہے کمھار سے تو کیا روندے موئے

اک دن ایسا آئے گا میں روندوں گی توئے

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