रहीम के दोहे
रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फाँकें तीन।।
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यह रहीम मानै नहीं, दिल से नवा जो होय।
चीता, चोर, कमान के, नये ते अवगुन होय।।
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सौदा करो सो करि चलौ, रहिमन याही बाट।
फिर सौदा पैहो नहीं, दूरि जान है बाट।।
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रहिमन अती न कीजिये, गहि रहिये निज कानि।
सैंजन अति फूले तऊ, डार पात की हानि।।
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रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।
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मुकता कर करपूर कर, चातक जीवन जोय।
एतो बड़े रहीम जल, ब्याल बदन विष होय।।
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रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहि।।
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याते जान्यो मन भयो, जरि बरि भस्म बनाय।
रहिमन जाहि लगाइये, सो रूखो ह्वै जाय।।
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यद्यपि अवनि अनेक हैं, कूपवंत सरिताल।
रहिमन मानसरोवरहिं, मनसा करत मराल।।
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स्वासह तुरिय जो उच्चरै, तिय है निहचल चित्त।
पूत परा घर जानिए, रहिमन तीन पवित्त।।
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रहिमन जाके बाप को, पानी पिअत न कोय।
ताकी गैल अकाश लौं, क्यों न कालिमा होय।।
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माह मास लहि टेसुआ, मीन परे थल और।
त्यों रहीम जग जानिये, छुटे आपुने ठौर।।
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होत कृपा जो बडेन की, सो कदाचि घटि जाय।
तौ रहीम मरिबो भलो, यह दुख सहो न जाय।।
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रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं।
जे जानत ते कहत नहि, कहत ते जानत नाहिं।।
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सर सूखे पच्छी उड़ै, औरे सरन समाहिं।
दीन मीन बिन पच्छ के, कहु रहीम कहुँ जाहिं।।
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रहिमन दुरदिन के परे, बड़ेन किए घटि काज।
पाँच रूप पांडव भए, रथवाहक नलराज।।
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रहिमन तब लगि ठहरिए, दान मान सनमान।
घटत मान देखिय जबहिं, तुरतहि करिय पयान।।
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भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघु भूप।
रहिमन गिरि तें भूमि लौं, लखौ तो एकै रूप।।
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समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात।
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात।।
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रहिमन जो तुम कहत हो, संगति ही गुन होय।
बीच उखारी रमसरा, रस काहे न होय।।
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रहिमन रिस सहि तजत नहिं, बड़े प्रीति की पौरि।
मूकन मारत आवई, नींद बिचारी दौरि।।
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रहिमन आँटा के लगे, बाजत है दिन राति।
घिउ शक्कर जे खात है, तिनकी कहा बिसाति।।
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रहिमन सुधि सबते भली, लगै जो बारंबार।
बिछुरे मानुष फिरि मिलें, यहै जान अवतार।।
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ससि की सीतल चाँदनी, सुंदर सबहिं सुहाय।
लगे चोर चित में लटी, घटि रहीम मन आय।।
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रहिमन याचकता गहे, बड़े छोट ह्वै जात।
नारायन हू को भयो, बावन आँगुर गात।।
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रहिमन मनहिं लगाइ के, देखि लेहु किन कोय।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय।।
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रीति प्रीति सब सों भली, बैर न हित मित गोत।
रहिमन याही जनम की, बहुरि न संगति होत।।
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रहिमन कहत सुपेट सों, क्यों न भयो तू पीठ।
रीते अनरीते करै, भरे बिगारत दीठ।।
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रहिमन को कोउ का करै, ज्वारी, चोर, लबार।
जो पत-राखनहार हैं, माखन-चाखनहार।।
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रहिमन अपने गोत को, सबै चहत उत्साह।
मृग उछरत आकाश को, भूमी खनत बराह।।
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रहिमन तीन प्रकार ते, हित अनहित पहिचानि।
पर बस परे, परोस बस, परे मामिला जानि।।
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रहिमन बिद्या बुद्धि नहिं, नहीं धरम, जस, दान।
भू पर जनम वृथा धरै, पसु बिनु पूँछ बिषान।।
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रहिमन भेषज के किए, काल जीति जो जात।
बड़े बड़े समरथ भए, तौ न कोउ मरि जात।।
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राम न जाते हरिन सँग,सीय न रावण साथ।
जो रहीम भावी कतहुँ, होत आपुने हाथ।।
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रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैंहैं लोग सब, बाँटि न लैहै कोय।।
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रहिमन जगत बड़ाइ की, कूकुर की पहिचानि।
प्रीति करै मुख चाटई, बैर करे तन हानि।।
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महि नभ सर पंजर कियो, रहिमन बल अवसेष।
सो अर्जुन बैराट घर, रहे नारि के भेष।।
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रहिमन अँसुआ नैन ढरि, जिय दुख प्रगट करेइ।
जाहि निकारो गेह ते, कस न भेद कहि देइ।।
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ससि, सुकेस, साहस, सलिल, मान सनेह रहीम।
बढ़त बढ़त बढ़ि जात हैं, घटत घटत घटि सीम।।
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लिखी रहीम लिलार में, भई आन की आन।
पद कर काटि बनारसी पहुँचे मगहर थान।।
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रहिमन चुप ह्वै बैठिए, देखइ दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहै देर।।
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माँगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बढ़ि काम।
तीन पैग बसुधा करी, तऊ बावनै नाम।।
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रहिमन सो न कछू गनै, जासों लागे नैन।
सहि के सोच बेसाहियो, गयो हाथ को चैन।।
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मनसिज माली की उपज, कहि रहीम नहिं जाय।
फल श्यामा के उर लगे, फूल श्याम उर आय।।
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रहिमन माँगत बडेन की, लघुता होत अनूप।
बलि मख माँगन को गए, धरि बावन को रूप।।
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मूढ़ मंडली में सुजन, ठहरत नहीं बिसेखि।
स्याम कचन में सेत ज्यों, दूरि कीजिअत देखि।।
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रहिमन उजली प्रकृत को, नहीं नीव को संग।
करिया बासन कर गहे, कालिख लागत अंग।।
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रूप बिलोकि रहीम तहँ, जहँ जहँ मन लगि जाय।
थाके ताकहिं आप बहु, लेत छोड़ाय छोड़ाय।।
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रहिमन रिस को छाँड़ि कै, करौ गरीबी भेस।
मीठो बोलो नै चलो, सबै तुम्हारो देस।।
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सब को सब कोऊ करै, कै सलाम कै राम।
हित रहीम तब जानिए, जब कछु अटकै काम।।
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