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कबीर

1398 - 1518 | लहरतारा, इंडिया

कबीर

चौपाई 8

शे'र 1

 

दोहा 4

आदि अछर ही अगम है ता को सब बिस्तार

सत-गुरु दया तें पाइए सत्तनाम निज सार

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जन्तर तंत्र सब झूठ है मत भरमो जग कोय

सत्त सबद जाने बिना कौवा हंस होय

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तन की आस सब छूटई मन का करै बिचार

मन चीन्हे बिन थित नहीं सत-गुरु कहैँ पुकार

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तिमिर मलिन तें ना टरे सूर उदय नहिं होय

सत्त सबद जो जानई करम भरम सब खोय

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राग आधारित पद 6

साखी 138

कबीर संगत साध की, हरै और की ब्याधि।

संगत बुरी असाध की, आठो पहर उपाधि ।।

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संगति भई तो क्या भया, हिरदा भया कठोर

नौ नेजा पानी चढ़ै, तऊ भीजै कोर ।।

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कायथ कागद काढ़िया, लेखा वार पार

जब लगि स्वास सरीर में, तब लगि नाम सँभार ।।

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अमृत केरी मोटरी राखी सतगुरु छोरि

आप सरीखा जो मिलै ताहि पिलावैं घोरि

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प्रेम भाव इक चाहिये भेष अनेक बनाय

भावे गृह में बास कर भावे बन में जाय

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होरी 1

 

सोरठा 3

 

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