कबीर के दोहे
आदि अछर ही अगम है ता को सब बिस्तार
सत-गुरु दया तें पाइए सत्तनाम निज सार
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जन्तर तंत्र सब झूठ है मत भरमो जग कोय
सत्त सबद जाने बिना कौवा हंस न होय
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तन की आस सब छूटई मन का करै बिचार
मन चीन्हे बिन थित नहीं सत-गुरु कहैँ पुकार
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तिमिर मलिन तें ना टरे सूर उदय नहिं होय
सत्त सबद जो जानई करम भरम सब खोय
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