हज़रत सुल्तान बाहू के अशआर
कर इबादत पच्छोतासें उमराँ चार दिहाड़े हू
थी सौदागर कर लै सौदा जाँ तक हट्ट न ताड़े हू
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अहफ़ तन मेरा चश्माँ होवे मैं मुर्शिद वीख नून रजाँ हू
लूँ लूँ दे मढ लिख लिख चश्माँ हक्क खोलहाँ हक्क कजाँ हू
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