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अमीनुद्दीन वारसी

- 1927 | लखनऊ, भारत

रुहानी शाइ’र और “वारिस बैकुंठ पठावन” के मुसन्निफ़

रुहानी शाइ’र और “वारिस बैकुंठ पठावन” के मुसन्निफ़

अमीनुद्दीन वारसी के दोहे

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पीतम पत तुम हाथ है लाज करूँ कह काज

भिक्षा माँगूँ आप से दान दियो महाराज

काह कहूँ कुछ बन नहीं आवत सुनो गरीब-नवाज

दीन-दयाल हरो दुख संकट लाज-पति महाराज

बैरी महा-बरियार है बैर करत हर-आन

दास तुम्हारी आस है पत राखो भगवान

साइन आए निबाहे लियो महा पड़ यों दुख माँह

धन निरास तुम आस है गहियो पीतम बाँह

जोत बिछाऊँ नैन की सीस धरूँ वही ठाँव

चरन धरूँ पीतम जहाँ और बसूँ जेह गाँव

मोरे तुम रघुबीर हो और नहीं कोऊ तीर

पीर हरो किरपा करो लाज धरो मन धीर

हाथ जोड़ पय्याँ परत माँगत पी से दान

एक बार किरपा करो धन तुम पर कुर्बान

पीतम पत तुम हाथ है दुखियन के राज

'अमीनुद्दीन' पे कृपा करो लाज रक्खो महाराज

मैं निर्गुणी प्रतिपाल पत सदअन आस तुम पास

नियरे रहो दयाल सत जस फूलन मा बास

हाथ जोड़ मिन्ती करत और नवावत सीस

धन निरास तुम आस है आन मिलो जगदीस

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