हिजाब-ए-चेहर:-ए-जाँ मी-शवद गु़बार-ए-तनम
हिजाब-ए-चेहर:-ए-जाँ मी-शवद गु़बार-ए-तनम
ख़ुशा दमे कि अज़ीं चेहर: पर्द: बर-फ़िगनम
मेरे जिस्म का ग़ुबार जान के चेहरे का हिजाब बनता है
वो वक़्त क्या अच्छा होगा जब उस चेहरे से पर्दा उठाऊँगा
चुनीं क़फ़स न सज़ा-ए-चुँ मन-ए-ख़ुश-इल्हानीस्त
रवम ब-गुल्शन-ए-रिजवाँ कि मुर्ग़-ए-आँ-चमनम
मुझ जैसे ख़ुश-इलहान के लिए ऐसा पिंजरा मुनासिब नहीं है
मैं रिज़वान के बाग़ में जाऊँगा इस लिए कि में उस चमन का परिंदा हों
अयाँ न शुद कि चरा आमदम कुजा बूदम
दरेग़-ओ-दर्द कि ग़ाफ़िल ज़े-कार-ए-ख़्वेशतनम
ये न खुला कि मैं क्यूँ आया कहाँ था
अफ़सोस और दर्द है कि मैं अपने काम से ग़ाफ़िल हूँ
चे-गून: तौफ़ कुनम दर फ़ज़ा-ए-आ'लम-ए-क़ुद्स
कि दर सरा चे तरकीब-ए-तख़्त: बंद तनम
मैं आलम-ए-क़ुदस की फ़िज़ा मैं किस तरह घूमूं
जब कि तरकीब की सराय में जिस्म में मेरी तख़ताबंदी कर दी गई है
अगर ज़े-ख़ून-ए-दिलम बु-ए-मुश्क मी-आयद
अजब मदार कि हमदर्द नाफ़:-ए-ख़ुतनम
अगर मेरे दल के ख़ून से इ’श्क़ की बू आती है
तो तअ’ज्जुब न कर इस लिए कि मैं ख़ुतन के नाफ़ा का हमदरद हूँ
मरा कि मंज़र-ए-हूरस्त-ओ-मस्कन-ओ-मावा
चरा ब-कू-ए-ख़राबातियाँ बुवद वतनम
जब कि मेरा मस्कन और मावा ख़ुद का मंज़र है
ख़राबातियों के कूचा में मेरा वतन क्यूँ हुआ
तराज़-ए-पैरहन-ए-ज़र कशम मुबींं चूँ शम्अ'
कि सोज़हास्त निहानी दरून-ए-पैरहनम
मेरे ज़रदोज़ी के लिबास की ज़ीनत को न देख इस लिए कि शम्अ’ की तरह
मेरे लिबास के नीचे बहुत सी सोज़िश हैं
बया ओ हस्ती-ए-'हाफ़िज़' ज़े-पेश-ए-ऊ बरदार
कि बावजूद-ए-तु कस न-शिनवद ज़े-मन कि मनम
आ जा और हाफ़िज़ के वुजूद को उस के सामने से उठा दे
इस लिए कि तेरे वुजूद के सामने कोई मुझ से नहीं सुनेगा कि मैं हूँ
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