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ख़ानक़ाह शाकिरिया, पिंड शरीफ़, शैखपुरा के 123वाँ उर्स मुबारक के मौक़े पर

सय्यद अमजद हुसैन

ख़ानक़ाह शाकिरिया, पिंड शरीफ़, शैखपुरा के 123वाँ उर्स मुबारक के मौक़े पर

सय्यद अमजद हुसैन

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    शेखपुरा ज़िले के पिंड शरीफ़ में मौजूद ख़ानक़ाह शाकिरिया की बुनियाद हज़रत सय्यद शाह ताजुद्दीन ‘शाकिर’ अबुलउलाई क़ादरी (1835–1921) ने रखी थी। आप सिमली शरीफ़, पटना के मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्ग हज़रत सय्यद शाह अली हुसैन ‘बाक़ी’ के मुरीद और ख़लीफ़ा थे। हज़रत ताजुद्दीन ‘शाकिर’ एक जाने-पहचाने सूफ़ी शायर भी थे। उनके नातिया कलाम का मजमूआ और हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (SAW) की हयात-ओ-करामात पर लिखी गई किताब “शहूद-ए-वहदत” आज भी उनके मक़ाम और इल्मी म'यार की गवाही देती है। अगरचे उनकी दूसरी किताबें अब सामने नहीं आतीं, लेकिन इस एक किताब को देखकर यह अंदाज़ा होता है कि उन्होंने और भी तसनीफ़ात लिखी होंगी, जो वक़्त की गर्द-ओ-ग़ुबार में गुम हो गईं।

    ख़ानक़ाह के मौजूदा सज्जादानशीं मुफ़्ती सय्यद फ़ैज़ानुल होदा मिस्बाही के मुताबिक़, हज़रत ताजुद्दीन ‘शाकिर’ ने काफ़ी अरसे तक नवाब हुसैनाबाद के यहाँ हकीमी की। नवाब ख़ानदान के किसी शख़्स की इल्तेज़ा पर वे हज़ारीबाग़ जड़ी-बूटियाँ लाने गए थे। उसी सफ़र के दौरान उन्हें एक बेहद ख़ास ज़ियारत नसीब हुई और एक बशारत भी मिली। इसके बाद उन्होंने हज़ारीबाग़ को पसंद फ़रमाया और सूफ़ियाना तालीम को आम करने में जुट गए। बाद में ख़ानक़ाह शाकिरिया, पिंड शरीफ़ के तीसरे सज्जादानशीं मौलाना सय्यद शाह अहसनुल होदा ने हज़ारीबाग़ में भी एक ख़ानक़ाह की बुनियाद रखी।

    ख़ानक़ाह के दूसरे सज्जादानशीं हज़रत मौलाना सय्यद शाह क़मरूल होदा ‘क़मर’ एक मशहूर शायर और मुसन्निफ़ थे। उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिनसे अपने दौर में बड़ी तादाद में लोगों ने फ़ायदा उठाया। उनकी मशहूर किताब “क़मरुल हज” की तारीफ़ मौलाना ज़फ़रुद्दीन बिहारी ने भी की है। मौलाना क़मरूल होदा के बहुत से मुरीद थे, जिनमें एक ख़ास नाम उड़ीसा के भद्रक में आराम फ़रमा बुज़ुर्ग मुजाहिद-ए-मिल्लत की वालिदा का भी आता है।

    उनके बाद तीसरे सज्जादानशीं मौलाना सय्यद शाह अहसनुल होदा हुए। आप मदरसा शम्सुल होदा के प्रिंसिपल रहे, ज़फ़रुद्दीन बिहारी के शागिर्द थे। आपके मुरीद बिहार, बंगाल, ओड़िशा और झारखंड तक फैले हुए थे। बीआईटी सिंदरी के पूर्व प्रोफेसर सज्जाद अहसन की किताब “सज्जादगान-ए-पिंड शरीफ़” के मुताबिक़, मौलाना अहसनुल होदा का इंतेक़ाल अजमेर शरीफ़ जाते वक़्त इलाहाबाद के क़रीब हुए एक सड़क हादसे में हुआ था।

    इसके बाद ख़ानक़ाह की ज़िम्मेदारी मौलाना सय्यद शाह रिज़वानुल होदा मिस्बाही के हाथ आई। पिंड शरीफ़ के सय्यद रुशान अली साहब के अनुसार, राजा बाबू तालीम पर ख़ास तवज्जो दी और बिहार के अलावा ओड़िशा, झारखंड और बंगाल में कई मदरसे क़ायम किए। वे ख़ुद शेखपुरा के संजय गांधी स्मारक महिला महाविद्यालय में प्रोफेसर रहे और काफ़ी समय तक इस्लामिया हाई स्कूल, शेखपुरा के प्रेसिडेंट भी रहे। उन्होंने पिंड शरीफ में जामिया अल्लामा अहसनुल होदा इंस्टिट्यूट के नाम से 2016 में एक आलीशान तालीमी इदारा बनवाया जिसमें तक़रीबन पूरे देश से बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं।

    हज़रत ताजुद्दीन ‘शाकिर’ के अजदाद का अस्ल ठिकाना शेखपुरा ज़िले का मौज़ा बरुई था, जहाँ पहले ख़ानक़ाह फ़रीदिया हुआ करती थी। उनके पूर्वज बिहार शरीफ़ के चाँदपुरा में आराम फ़रमा हज़रत सय्यद शाह फ़रीदुद्दीन तवेला बख़्श चिश्ती के चिश्तिया-फ़रीदिया सिलसिले से ताल्लुक़ रखते थे, यानी फ़रीदी थे। ख़ानक़ाह शाकिरिया के दूसरे सज्जादानशीं हज़रत सय्यद शाह क़मरूल होदा ‘क़मर' अबुलउलाई ने अपनी किताब “लमआत-ए-क़मरिया” में लिखा है कि मौज़ा बरुई की ख़ानक़ाह फ़रीदिया के सज्जादानशीं उनके पूर्वज हज़रत सय्यद शाह नूरुल हसन थे, लेकिन मामलात-ए-दुनिया की वजह से उन्होंने सज्जादगी छोड़कर मौज़ा पिंड की तरफ़ हिजरत कर ली। उसी वक़्त से यह ख़ानदान पिंड शरीफ़ में आबाद है और आज तक यह रूहानी सिलसिला जारी है।

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