Dohe of Swami Bhagvandas Ji Niranjani
थांन मुकाम प्रमान यह, क्षेत्रवास सु नाम।।
तहाँ ग्रन्थ पूरण प्रगट, जो भाखै भगवान।।
पी पीयूष जीव जुगति सौं, तजि अयुक्त अज्ञान।।
अखंड धार ज्यूं तैल की, सो अमृत परमान।।
अमृत धारा ग्रन्थ यह, कह्यौ वेद प्रमान।।
अर्जुनदास प्रकासगुरु, तत सेवग भगवान।।
अर्थ धर्म अरु काम पुनि, त्याग पदारथ तीन।।
सो अधिकारी मोक्ष को, महाज्ञान परवीन।।
यह संशय की ग्रन्थि है, कही अल्प कर सोइ।।
गुरु शास्त्र प्रतीति नहिं, निश्चय कछु न होइ।।
परंब्रह्म परमात्मा, है परोक्ष पद जास।।
ग्यान अज्ञ प्रत्यक्ष को, कीन्हौ ग्रन्थ प्रकाश।।
मंगल रूप स्वरूप मम, निजानन्द पद जास।।
लह्यौ मंगलाचरन यह, सौहं हंस प्रकास।।
सत्रह सै अठाईसा, सम्वत् संख्या जान।।
कातिग तृतिया प्रथम ही, पूरण ग्रन्थ प्रमान।।
जगके बंधन ज्ञान तैं, मुक्त होन की आस।।
आस वास विस्वास तजि, सो मुमुक्षु परकास।।
साधू संग प्रताप तैं, श्री गुरु ग्यान प्रकाश।।
शुद्धनिरंजन ग्यांन लहि, कीन्हौ वचन विलास।।