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Swami Bhagvandas Ji Niranjani

Swami Bhagvandas Ji Niranjani

Doha 10

अमृत धारा ग्रन्थ यह, कह्यौ वेद प्रमान।।

अर्जुनदास प्रकासगुरु, तत सेवग भगवान।।

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अर्थ धर्म अरु काम पुनि, त्याग पदारथ तीन।।

सो अधिकारी मोक्ष को, महाज्ञान परवीन।।

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थांन मुकाम प्रमान यह, क्षेत्रवास सु नाम।।

तहाँ ग्रन्थ पूरण प्रगट, जो भाखै भगवान।।

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यह संशय की ग्रन्थि है, कही अल्प कर सोइ।।

गुरु शास्त्र प्रतीति नहिं, निश्चय कछु होइ।।

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सत्रह सै अठाईसा, सम्वत् संख्या जान।।

कातिग तृतिया प्रथम ही, पूरण ग्रन्थ प्रमान।।

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Kavitt 1

 

Savaiya 1

 

Sorthaa 4

 

Manhar 2

 

Arill 2

 

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