अगर किसी का एक भी अमल शरीअत के ख़िलाफ़ है, तो वह सूफ़ी नहीं, बल्कि शैतान है। उस से दूर रहना चाहिए।
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दान करने से ख़ुदा के बंदों का हक़ अदा होता है और पता चलता है कि अमीर लोगों को ख़ुदा के मुक़ाबले माल से कहाँ तक मोहब्बत है।
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जो पीर - बातिनी क़ुव्वत न रखे, हर वक़्त मुरीद की ख़बर न रखे, उसे गुनाह और बुरे कामों से न रोके, उस के आख़िरी वक़्त में ख़ुदा और रसूल से उस के हक़ में दुआ न करे, उसे नाज़ुक वक़्त में सही और सालिम पार न उतारे। ऐसे पीर न कहना चाहिए।
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दुनिया के लोग - दुनिया और माल-ओ-दौलत के ग़ुलाम है और ये सब ख़ुदा के फ़क़ीर के ग़ुलाम हैं।
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फ़िक्र-ओ-मा’रिफ़त - ख़ुदाई दरिया की लहरे हैं और दानशीलता व करम ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं, जो ख़ुदा से मिलाती हैं।
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