सम्मेलन पत्रिका के आलेख
सूफ़ी काव्य में भाव ध्वनि- डॉ. रामकुमारी मिश्र
भाव स्पष्टतः स्थायी भावों से सम्बद्ध हैं किन्तु विभावों की सम्यक् योजना न होने पर भी वे प्रयुक्त हो सकते हैं अतः अनुभवों के आधार पर अथवा चित्तवृत्तियों की प्रधानता के अनुसार भाव ध्वनियों का निर्णय समीचीन प्रतीत होता है। सूफ़ी काव्यों (14-16वीं शती के)
दक्खिनी हिन्दी के सूरदास-सैयद मीरां हाशमी- डॉ. रहमतउल्लाह
ब्रजभाषा के महाकवि सूरदास के अतिरिक्त दक्खिनी हिन्दी में भी एक सूरदास हो चुका है जिसका नाम सैयद मीरां हाशमी बताया जाता है और जो दक्षिण भारत के आदिलशाही राज्यकाल का प्रसिद्ध कवि था। दक्खिनी हिन्दी का अधिकांश साहित्य इसी राज परिवार के संरक्षण में लिखा
संतों के लोकगीत- डॉ. त्रिलोकी नारायण दीक्षित, एम.ए., पी-एच.डी.
सन्त साहित्य के विद्वान डॉ. दीक्षित लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के व्याख्याता है। आपने इस लेख में सन्तों के लोकगीतों पर विवेचना करते हुए उनका एक संक्षिप्त परिचायत्मक इतिहास प्रस्तुत किया है। -संपादक लोकगीत के वर्ण्य विषय अव्यक्तिक व्यापक
सन्तों की प्रेम-साधना- डा. त्रिलोकी नारायण दीक्षित, एम. ए., एल-एल. बी., पीएच. डी.
मानव ने परम ज्योति परब्रह्म के दर्शन नहीं किए परन्तु उसके गुणगान की परम्परा प्राचीन- बड़ी ही प्राचीन है। सभ्यता एवं शिक्षा के प्रकाश-प्रसार के पूर्व, समाज की स्थापना से भी पूर्व के आदिम मानव को इस विश्व के संचालन में, एक ही पेड़ में विविध प्रकार के फूलों
मुसलमान शासकों का संस्कृत प्रेम- श्री हरिप्रताप सिंह
लगभग सभी भातरीय भाषाओं की जननी देवभाषा संस्कृत को यह गौरव प्राप्त है कि विदेशों से आये हुये मुस्लिम-शासकों ने भी इसकी सेवा की। भारत में मुस्लिम शासन के प्रारंभिक काल, 12वीं शताब्दी से लेकर 17वी शताब्दी तक की अवधि में ऐसे अनेक मुसलमान-शासक हुये, जिन्होंने
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere