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Sufinama

रज्जब

साखी 6

रज्जब राम न रहम कर, अक्षर लिखे न भाल ।

ताथें सद्गुरू ना मिल्या, गुरू शिष रहे कंगाल ।।

शिष सारे गुरू को गिलैं, गुरू सेवक सब खाय ।

रज्जब दोनो यूं मिले, हरि में कौन समाय ।।

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कोयल अंडे काक गृह, सुत निपजे पर सेव ।

त्यों रज्जब शिष भाव को, प्रति पाले गुरू देव ।।

रज्जब काया काठ में, प्रकटी आज्ञा आग ।

मन शिष निकस्या धूम ज्यों, गया गगन गुरू लाग ।।

जीव जल हिमगिरि होत है, शक्ति शीत के संग ।

सो पाषाण पानी भया, गुरू ग्रीषम के अंग ।।

कूवे बाय तलाब के, धणियों कछू न होय ।

जन रज्जब जल जाँहि सूर में, त्यों सद्गुरू सब कोय ।।

गुरू गाफिल देखत रहैं, सद्गुरू शिष ले जाय ।

रज्जब पहुंचे गीध ज्यों, अति चलते के पाय ।।

विविध बास बहु बंदगी , चले पवन सँग पीर ।

रज्जब स्रक सौरभ ज्यों, विरला पहुँचे वीर ।।

एक गुरू है आरसी, शिष चख अटके वार ।

जन रज्जब चश्मा गुरू, काढ़ै अपने पार ।।

जे काजी काईन पढे, तो कुछु खसम न होय ।

रज्जब व्याह कराय कर, ब्राह्मण बींद न कोय ।।

गुरू तरू शिष लागे सु यूं, ज्यों डाल पान फल फूल ।

बात घात इक झड़ पड़ै, एक न छाडै मूल ।।

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गुरू दादू रू कबीर की, काया भयी कपूर ।

जन रज्जब उनकी दया, पाई निश्चल ठौर।।

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सांई लग सेवा रची, टरया न अपनी टेक ।

दादू सम नहिं दूसरा, दीरध दास सु एक ।।

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तन मन धक्का देत है, पुनि धक्का पंच भूत ।

रज्जब इनमे ठाहरै, सो आतम अबधूत ।।

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