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राबिया बसरी

710 - 801 | बसरा, इराक़

राबिया बसरी

सूफ़ी उद्धरण 18

जब उन से दुनिया की किसी ऐसी चीज़ के बारे में पूछा गया जो वो हासिल करना चाहती थीं, तो उन्होंने जवाब दिया: मुझे उस ज़ात से दुनिया की कोई चीज़ माँगते हुए शर्म आती है जिसकी यह दुनिया है; फिर मैं उन लोगों से दुनिया की कोई चीज़ कैसे माँग सकती हूँ, जिन की यह दुनिया है ही नहीं।

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जो काम हिकमत से ख़ाली है, वो आफ़त है। जो ख़ामोशी हिकमत से ख़ाली है, वो ग़फ़लत है। जो नज़र हिकमत से ख़ाली है, वो ज़िल्लत है।

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ऐ नफ़्स! तू ख़ुदा से मुहब्बत का दावेदार है और उस की नाफ़रमानी भी करता है। अगर तू मुहब्बत में सादिक़ है तो अपने रब की इताअत भी कर। मुहब्बत करने वाला अपने महबूब की इताअत ज़रूर करता है।

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मुझे अज्र-ओ-सवाब की उम्मीद उस वक़्त होती है, जब अपने आ'माल-ओ-इबादत को हल्का समझती हूँ और उस वक़्त जब मेरा भरोसा सिर्फ़ ख़ुदा के फ़ज़्ल-ओ-करम पर रहता है।

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जब तक मैं इस दुनिया में हूँ, इस दुनिया से मेरी सिर्फ़ यही चाहत है कि तुझे याद रखूँ, और आख़िरत में मेरी वाहिद आरज़ू तेरा दीदार है। इस के अलावा, तू मेरे साथ जो चाहे कर।

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