औरतें प्रतिभा और आध्यात्मिक्ता में समान रूप से संपन्न हैं. वे आध्यात्मिक अनुशासन में पुरुषों के बराबर हैं.
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अगर एक आदमी अपना ग़ुस्सा किसी दूसरे इंसान पर निकालता है और दूसरा आदमी सब्र करता है, तो उन में नेक रवैया उस का है, जो सब्र करता है।
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ख़ुदा के हुक्म सीधे इंसान के दिल में आते हैं, कोई फ़रिश्ता बीच में नहीं होता।
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लोग दूसरों के हर काम का हिसाब रखते हैं, लेकिन अपनी ज़िंदगी पर कभी ग़ौर नहीं करते।
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हर अच्छे-बुरे काम का पैदा करने वाला ख़ुदा है, क्योंकि जो भी चीज़ इंसान को मिलती है, वो ख़ुदा के हुक्म से मिलती है। तो फिर किसी ख़ास आदमी से क्यों नाराज़ होना?
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