मुल्ला जामी के परिचय
मूल नाम : नुरुद्दीन अब्दुर्रहमान जामी
पूरा नाम मुल्ला नूरुद्दीन अब्दुल रहमान| जामी के नाम से विख्यात| पचास से अधिक किताबों के रचियता जिनमे तीन दीवान, सात प्रेम-कहानियां और मसनवियाँ हैं इन्होंने इतने मौजूआत पर अपनी कलम उठायी है कि सोच हैरत में पड़ जाती है| मुहम्मद साहेब (pbuh) के उपदेशों से लेकर पौराणिक कहानियों, संतों के तज़किरों, व्याकरण और पिंगल इत्यादि पर भी इन्होने लिखा है| रहस्यवाद पर इनकी दो किताबें उल्लेखनीय हैं- लवाहे और तोहफ़तुल अहरार| लवाहे तसव्वुफ़ की प्रमुख पुस्तकों में से एक हैं | ख्यालों की उड़ान, भाषा और शैली के आधार पर इसकी तुलना मौलाना रूम की मसनवी और अत्तार की मंतिक -उत -तैर से होती है. जामी पर इन दोनों का ख़ासा प्रभाव था| इनकी आज़ाद ख़याली इन्हें सब से अलग पहचान देती है| ये कभी किसी दरबार में नहीं गए| जिस वक़्त इनकी मृत्यु हुई वो प्रसन्न भी थे और निर्धन भी | पैगम्बर के अल फखरू फ़क़ीरी को इन्होने अपने जीवन में आत्मसात किया था| इनकी रचनाओं में व्यंग्य भी खूब मिलता है | एक दफ़ा ये कुछ पढ़ रहे थे जिसका आशय था -
"तुम मेरी निद्राहीन आँखों और दुखी दिल में इस तरह बस रहे हो गोया दूर से आते हर शख्श में मुझे तुम्हारी सूरत ही नज़र आती है ."
इसी वक़्त किसी ने पूछ लिया -
मान लीजिये कि वो गधा हो ?
जामी ने उत्तर दिया -मैं तो सोचता हूँ वहां तुम्ही हो |
प्रमुख रचनायें-
१.लवाहे
२. युसूफ़ ज़ु जुलैखा
३. लैला मजनूं
४. सुलेमान अवज़ाल