Font by Mehr Nastaliq Web
Sufinama
Dayaa Bai's Photo'

दया बाई

डेहरा, इंडिया

दया बाई के दोहे

श्रेणीबद्ध करें

बंदो श्री सुकदेव जी सब बिधि करो सहाय ।

हरो सकल जग आपदा प्रेम-सुधा रस प्याय ।।

दया प्रेम उनमत्त जे तन की तनि सुधि नाहिं ।

झुके रहैं हरि रस छके थके नेम ब्रत नाहिं ।।

तात मात तुम्हरे गये तुम भी भये तयार ।

आज काल्ह में तुम चलौ 'दया' होहु हुसियार ।।

निःकलंक नरसिंध जू, निरंजन अलख अभेव ।

निराकार निरभय मगन, नारायन नित-देव ।।

देह धरौं संसार में, तेरो कहि सब कोय ।

हाँसी होय तौ तेरिही, मेरी कछू न होय ।।

लाख चूक सुत से परै, सो कछु तजि नहिं देह ।

पोष चुचुक ले गोद में, दिन दिन दूनों नेह ।।

भवजल नदी भयावनी, किस बिधि उतरूँ पार ।

साहिब मेरी अरज है, सुनिये बारम्बार ।।

'दया' नाव हरि नाम की सतगुरु खेवनहार ।

साधू जन के संग मिलि तिरत न लागै बार ।।

पूजा अरचन बंदगी, नहिं सुमिरन नहिं ध्यान ।

प्रभुजी अब राखे बने, बिर्द बाने की कान ।।

कब को टेरत दीन भो, सुनौ न नाथ पुकार ।

की सरवन ऊँचौ सुनो, की बिर्द दियो बिसार ।।

नहिं संजम नहिं साधना, नहिं तीरथ ब्रत दान ।

मात भरासे रहत है, ज्यों बालक नादान ।।

ठग पापी कपटी कुटिल, ये लच्छन मोहिं माहिं ।

जैसो तैसो तेर ही, अरु काहू को नाहिं ।।

हाथी बूड़ो सूँड़ लों, जब हीं करी पुकार ।

ग्राहतें आन छुड़ाइया, लगी न रंचक बार ।।

बेर बेर चूकत गयों, दीजै गुसा बिसार ।

मिहरबान होइ रावरे, मेरी ओर निहार ।।

हौं अनाथ तोहिं बिनय करि, भय सों करूँ पुकार ।

दयादास तन हेर प्रभु, अब के पार उतार ।।

किस बिधि रीझत हौ प्रभू, का कहि टेरूँ नाथ ।

लहर मेहर जब हीं करो, तब हीं होउँ सनाथ ।।

जैसे सूरज के उदय, सकल तिमिर नस जाय ।

मेहर तुम्हारी हे प्रभु, क्यों अज्ञान रहाय ।।

कर्म रूप दरियाव से, लीजै मोहिं बचाय ।

चरन कमल तर राखिये, मेहर जहाज चढ़ाय ।।

भयमोचन अरू सर्बमय, ब्यापक अचल अखंड ।

दयासिंधु भगवानजू, ताकै सिव ब्रह्मंड ।।

भाई बंधु कुटुम्ब सब भये इकट्ठे आय ।

दिना पाँच को खेल है 'दया' काल ग्रसि जाय ।।

दया दीन पर करत हो, सो किमि लेखी जाहि ।

बेद बिरद बोलत फिरै, तीन लोक के माहिं ।।

टेर सुनी प्रहलाद की, नरसिंह हो बनि आय ।

हिरनाकुस को मारि कै, जन को लीन बचाय ।।

जो नहिं अधम उधारनो, तौ नहिं गहते फेंट ।

बिर्द की पैज सम्हारि लो, सकल चूक को मेट ।।

जो मेरे करमन लखो, तौ नहिं होत उबार ।

दयादास पर दया करि, दीजै चूक बिसार ।।

जगत सनेही जीव है राम सनेही साध ।

तन मन धन तजि हरि भजैं जिनका मता अगाध ।।

सकल मेघ लै इन्द्र जब, ब्रज पै बरसो आय ।।

गोबरधन नख पै धरो, सब ब्रज लियो बचाय ।।

जैसो मोती ओस का तैसो यह संसार ।

बिनसि जाय छिन एक में 'दया' प्रभू उर धार ।।

पैरत थाको हे प्रभू, सूझत वार न पार ।

मेहर मौज जब हीं करो, तब पाऊँ दरबार ।।

कछू दोष तुम्हरो नहीं, हमरी है तकसीर ।

बीचहिं बीच बिबस भयो, पाँच पचीस के भीर ।।

अनंत भानु तुम्हरी मेहर, कृपा करो जब होय ।

दयादास सूझै अगम, दिब्य दृष्टि तन होय ।।

और नज़र आवै नहीं, रंक राव का साह ।

चिरहटा के पंख ज्यों, थोथो काम देखाह ।।

हौं गरीब सुन गोबिंदा, तुही गरीब-निवाज ।

दयादास आधीन के, सदा सुधारन काज ।।

जेते करम हैं पाप के, मोसे बचे न एक ।

मेरी ओर लखो कहा, बिर्द बानो तन देख ।।

लोहा पारस के निकट, कंचन ही सो होय ।

जितना चाहै लै करै, लोहा कहै न कोय ।।

दुख तजि सुख की चाह नहिं, नहिं बैकुंठ बेवान ।

चरन कमल चित चहत हौं, मोहिं तुम्हारी आन ।।

असु गज अरु कंचन 'दया' जोरे लाख करोर ।

हाथ झाड़ रीते गये भयो काल को जोर ।।

स्याम घटा घन देखि कै, बोलत गहगह मोर ।

ब्रजबासी तिमि जी उठैं, चितवत हरि की ओर ।।

तीन लोक नौ खंड के लिए जीव सब हेर ।

'दया' काल परचंड है मारै सब कूँ घेर ।।

ब्रह्म बिसंभर बासुदेव, बिस्वरूप बलबीर ।

ब्यास बोध बाधाहरन, ब्यापक सकल सरीर ।।

नर देही दीन्हीं जबै, कीन्हो कोटि करार ।

भक्ति कबूली आदि में, जब में भयो लबार ।।

बड़े बड़े पापी अधम, तारत लगी न बार ।

पूँजी लगै कछु नंद की, हे प्रभू हमरी बार ।।

तेरी दिस आसा लगी, भ्रमत फिरौं सब दीप ।

स्वाँती मिलै सनाथ हो, जैसे चातृक सीप ।।

हौं पाँवर तुम हौ प्रभू, अधम-उधारन ईस ।

दयादास पर दया हो, दयासिंधु जगदीस ।।

चकई कल में होत है, भान उदय आनन्द ।

दयादास के दृगन तें, पल न टरो ब्रज-चंद ।।

गिरिधर गोबिन्द गोपधर, गरुड़ध्वज गोपाल ।

गोबर्धन श्रीगदाधर, गज-तारन ग्रह-साल ।।

चित चातृक रटना लगी, स्वाँती बूँद की आस ।

दया-सिध भगवान जू, पुजवौ अब की आस ।।

'दया कुंवर' या जक्त में नहीं आपनो कोय ।

स्वारथ-बंधी जीव है राम नाम चित जोय ।।

सीस नवै तौ तुमहिं कूँ, तुमहिं सुं भाखूँ दीन ।

जो झगरौं तौ तुमहिं सूँ, तुम चरनन आधीन ।।

तुम ठाकुर त्रैलोक-पति, ये ठग बस करि देहु ।

दयादास आधीन की, यह बिनती सुनि लेहु ।।

छाँड़ौ बिषै बिकार कूँ राम नाम चित लाव ।

दया कुँवर' या जगत में ऐसो काल बिताव ।।

Recitation

बोलिए