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अहमद रज़ा ख़ान

1856 - 1921 | बरेली, भारत

अहमद रज़ा ख़ान

शे'र 1

 

फ़ारसी कलाम 1

 

रूबाई 7

बैत 1

 

सूफ़ी उद्धरण 8

ख़ुदा के आशिक़, ख़ुदा के नूर से आसमान और ज़मीन की छिपी हुई चीज़ों को देखते हैं। इसलिए अपने आप को उन की तरह समझो।

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दुनिया की लज़्ज़तों की ख़्वाहिश रखने वाले लोग उस शख़्स की मानिंद है, जो समंदर के खारे पानी से अपनी प्यास बुझाता है। वो जितना ज़्यादा पानी पीता है, उस की प्यास उतनी ही बढ़ती जाती है।

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ये बेहतर है कि दूसरों के नेक आमाल को ज़ाहिर किया जाए और उन के बुरे कामों से आँख बचा ली जाए।

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ये विलायत की निशानी है कि इंसान ख़ुदा के तमाम बंदों पर शफ़क़त करे, उन से रहमदिली बरते। उन के लिए और उन के साथ बुरी ताक़तों के ख़िलाफ़ जद्दोजहद करे।

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यह सूफियों का क़ायदा है कि फ़क़्र उन का श्रृंगार हो, सब्र उन का आभूषण हो, रज़ा (संतोष) उन की सवारी हो, और तवक्कुल (विश्वास) उन की शान हो।

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ना'त-ओ-मनक़बत 48

सलाम 2

 

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अज्ञात

तू है वो ग़ौस कि हर ग़ौस है शैदा तेरा

ओवैद रज़ा क़ादरी

लम-याते नज़ीरोका फ़ी नज़रिन मिस्ल-ए-तू न शुद पैदा जाना

मुंशी रज़ीउद्दीन

लम-याते नज़ीरोका फ़ी नज़रिन मिस्ल-ए-तू न शुद पैदा जाना

फरीद अयाज़

वाह क्या जूद-ओ-करम है शह-ए-बतहा तेरा

ओवैद रज़ा क़ादरी

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