सीनः-अम ज़े-आतिश-ए-दिल दर ग़म-ए-जानाना ब-सोख़्त
सीनः-अम ज़े-आतिश-ए-दिल दर ग़म-ए-जानाना ब-सोख़्त
आतिशे बूद दरीं ख़ान: कि काशान: ब-सोख़्त
हृदय की अग्नि से मेरा सीना यार की जुदाई में जल गया है। इस घर की आग ने सारे घर को जलाकर भस्म कर डाला है।
तनम अज़ वास्त:-ए-दूरी-ए-दिलबर ब-गुदाख़्त
जानम अज़ आतिश-ए-इश्क़-ए-रुख़-ए-जानानाँ ब-सोख़्त
प्यारे के विरह में मेरा शरीर घुल गया और उसके प्रणय ने मेरे प्राणो में ही आग लगा दी।
हर कि ज़ंजी-ए-सर-ए-जुल्फ़-ए-परी रु-ए-तू दीद
शुद परेशान-ओ-दिलश बर मन-ए-दीवान: ब-सोख़्त
जिस मनुष्य ने किसी प्रियतम की काली अलकों को देखा है, उसका आकुल हृदय मुझ पागल पर जलने लगा है।
सोज़-ए-दिल बीं कि ज़े-बस आतिश-ए-अश्कम दिल-ए-शम्अ
दोश बर मन ज़े-सर-ए-मेहर चु परवानः ब-सोख़्त
मेरे हृदय की तपन को तो देखो कि मेरे आँसुओं की गर्मी के होते हुए भी दीपक का दिल पतंगे के समान, मुझ पर तरस खा के गत समय जल कर भस्म हो गया।
ख़िर्क:-ए-ज़ोहद मरा आब-ए-ख़राबात ब-बुर्द
ख़ान:-ए-अक़्ल-ए-मरा आतिश-ए-ख़ुम-ख़ानः ब-सोख़्त
मेरी पवित्रता के लिबास को मदिरा-गृह के पानी ने डुबा दिया और वहाँ की अग्नि ने मेरी बुद्धि के घर को जला दिया।
आश्नाए न-ग़रीब-अस्त कि दिल सोज़-ए-मन-अस्त
चूँ मन अज़ ख़्वेश ब-रफ़्तम दिल-ए-बेगाना ब-सोख़्त
मुझे पागल देखकर दूसरों का हृदय भी पिघल गया है, फिर यदि मेरे मित्र मेरे ऊपर दयालु हैं तो इसमें आश्चर्य करने की कौनसी बात है।
माजरा कम कुन-ओ-बाज़ आ कि मरा मर्दुम-ए-चश्म
ख़िर्क: अज़ सर ब-दर आवर्द-ओ-ब-शुकराना: ब-सोख़्त
बहुत बातें बनाना उचित नहीं है। आओ, अब लौट आओ। मेरे शरीर ने तुम्हारे आगमन की प्रसन्नता में अपने वस्त्रों को भी जला डाला है।
चूँ प्याल: दिलम अज़ तौब: कि कर्दम ब-शिकस्त
चूँ सुराही जिगरम बे-मय-ओ-पैमान: ब-सोख़्त
मैंने जो आन खीची थी, उसके कारण मेरा हृदय प्याले के समान टुकड़े टुकड़े हो गया है और मदिरा और प्याले के बिना मेरा दिल लाला के फूल के समान जल गया है।
तर्क-ए-अफ़सान: ब-गो 'हाफ़िज़'-ओ-मय-नोश दमे
कि न ख़ुफ़्तेम शब-ओ-शम्अ'-ओ-अफ़सान: ब-सोख़्त
ऐ हाफ़िज़। अब इस कहानी को बन्द कर दो और थोड़ी देर बैठकर मदिरा पी लो और दम ले लो। दीपक यह कहानी सुनते ही सुनते बुझ भी गया और हम भी इसी के सुनने में रात भर जगते रहे।
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