मिल कर सनम से अपने हंगाम-ए-दिल-कुशाई
मिल कर सनम से अपने हंगाम-ए-दिल-कुशाई
हँस कर कहा ये हम ने ऐ जाँ बसंत आई
सुनते ही उस परी ने गुल-गुल शगुफ़्ता हो कर
पोशाक-ए-ज़र-फ़िशानी अपनी वहीं रंगाई
जब रंग के आई उस की पोशाक पर नज़ाकत
सरसों की शाख़ पर गुल फिर जल्द इक मँगाई
एक पंखुड़ी उठा कर नाज़ुक सी उँगलियों में
रंगत फिर उस की अपनी पोशाक से मिलाई
जिस दम किया मुक़ाबिल किसवत से अपने उस को
देखा तो उस की रंगत उस पर हुई सिवाए
फिर तो ब-सद मसर्रत और सौ नज़ाकतों से
नाज़ुक बदन पर अपने पोशाक वो खपाई
चम्पे का 'इत्र मल कर मोती से फिर ख़ुशी हो
सीमीं कलाइयों में डाले कड़े तिलाई
बन-ठन के इस तरह से फिर राह ली चमन की
देखी बहार-ए-गुलशन बहर-ए-तरब फ़िज़ाई
जिस जिस रविश के ऊपर जाकर हुआ नुमायाँ
किस किस रविश से अपनी आन-ओ-अदा दिखाई
क्या क्या बयाँ हो जैसे चमकी चमन चमन में
वो ज़र्द-पोशी उस की वो तर्ज़-ए-दिलरुबाई
सद-बर्ग ने सिफ़त की नर्गिस ने बे-तअम्मुल
लिखने को वस्फ़ उस का अपनी क़लम उठाई
फिर सहन में चमन के आया ब-हुस्न-ए-ख़ूबी
और तुर्फ़ा-तर बसंती इक अंजुमन बनाई
इस अंजुमन में बैठा जब नाज़-ओ-तमकनत से
गुलदस्ता उस के आगे हँस हँस बसंत लाई
की मुतरिबों ने ख़ुश ख़ुश आग़ाज़-ए-नग़्मा-साज़ी
साक़ी ने जाम-ए-ज़र्रीं भर भर के मय पिलाई
देख उस को और महफ़िल उस की 'नज़ीर' हर दम
क्या क्या बसंत आकर उस वक़्त जगमगाई
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