दोग़लापन ये है कि दिल को इबादत में ख़ुदा के अलावा किसी और की तरफ़ मोड़ दिया जाए, उस तरफ़ जिस की इजाज़त ख़ुदा ने नहीं दी।
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सूफ़ियों को चाहिए कि वे मुसीबत को ताक़त और सब्र के साथ बर्दाश्त करे।
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सूफ़ी को चाहिए कि वह लोगों से उनकी समझ और ज़हनी सलाहियत के हिसाब से बात करे और जो नया तालिब-ए- राह हो, उसे भी चाहिए कि वह किसी भी मसले पर तब तक बोले, जब तक उससे पूछा न जाए।
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सूफ़ी, तफ़रीह, घमंड, दिखावे या दुनियावी चीज़ें हासिल करने के लिए सफ़र नहीं करता।
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सूफ़ी, सिर्फ़ वही खाना खाता है, जिस के बारे में वो जानता है कि कहाँ से आया है। वो ज़ालिम और गुनाहगार इंसान का खाना खाने से परहेज़ करता है।
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