آسی غازیپوری کے دوہے
मन मा राखूं मन जरे, कहूं तो मुख जरि जाय।
गूंगे का सपना भयो, समझ समझ पछताय।।
कर कम्पे लिखनी डिगे, अंग अंग थहराय।
सुधि आवत छाती फटे, पांती लिखी न जाय।।
भुज फरकत तोरे मिलन को, स्रवन सुनन को बैन।
मन माला तोहि नाम का, जपत रहत दिन रैन।।
ओस ओस सब कोई कहे, आंसू कहै न कोय।
मोहि विरहिन के सोग मे, रैन रही है रोय।।
मै चाहूं कि उड़ चलूं, पर बिन उड़ा न जाय।
काह कहौं करतार को, (जो) पर ना दिया लगाय।।