Saakhi of Sant Jambhnath
वही अपार सरूप तू, लहरी इंद्र धनेस ।
मित्र वरुण और अरजमा, अदिती पुत्र दिनेस।।
तु सरवग्य अनादि अज, रवि सूम करत प्रकास।
एक पाद में सकल जग, निसदिन करत निवास।।
इत अपार संसार में, किस बिध उतरूं पार।
अनन्य भगत मैं आपका, निश्चल लेहु उबार।।