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Sahjo Bai

1725 | Delhi, India

Sahjo Bai

Chaupai 13

Doha 18

अड़सठ तीरथ गुरु चरण, परवी होत अखंड।

सहजो ऐसो धाम ना, सकल अंड ब्रह्मंड।।

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ज्ञान भक्ति अरु जोग का, घट लेवै पहँचान।

जैसी जाकी बुद्धि है, सोइ बतावै ध्यान।।

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निर्मल आनँद देत हौ, ब्रह्म रूप करि देत।

जीव रूप की आपदा, व्याधा सब हरि लेत।।

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सिख का माना सतगुरू, गुरु झिड़कै लख बार।

सहजो द्वार छोड़िये, यही धारना धार।।

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हरि करिपा जो होय तो, नाहिं होय तो नाहिं।

पै गुरु किरपा दया बिनु, सकल बुद्धि बहि जाहिं।।

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Raga Based Poetry 1

 

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