Font by Mehr Nastaliq Web
Sufinama
noImage

Rajjab

1557 | Sanganer, India

Saakhi of Rajjab

रज्जब राम रहम कर, अक्षर लिखे भाल

ताथें सद्गुरू ना मिल्या, गुरू शिष रहे कंगाल ।।

शिष सारे गुरू को गिलैं, गुरू सेवक सब खाय

रज्जब दोनो यूं मिले, हरि में कौन समाय ।।

कोयल अंडे काक गृह, सुत निपजे पर सेव

त्यों रज्जब शिष भाव को, प्रति पाले गुरू देव ।।

रज्जब काया काठ में, प्रकटी आज्ञा आग

मन शिष निकस्या धूम ज्यों, गया गगन गुरू लाग ।।

जीव जल हिमगिरि होत है, शक्ति शीत के संग

सो पाषाण पानी भया, गुरू ग्रीषम के अंग ।।

कूवे बाय तलाब के, धणियों कछू होय

जन रज्जब जल जाँहि सूर में, त्यों सद्गुरू सब कोय ।।

गुरू गाफिल देखत रहैं, सद्गुरू शिष ले जाय

रज्जब पहुंचे गीध ज्यों, अति चलते के पाय ।।

विविध बास बहु बंदगी , चले पवन सँग पीर

रज्जब स्रक सौरभ ज्यों, विरला पहुँचे वीर ।।

एक गुरू है आरसी, शिष चख अटके वार

जन रज्जब चश्मा गुरू, काढ़ै अपने पार ।।

जे काजी काईन पढे, तो कुछु खसम होय

रज्जब व्याह कराय कर, ब्राह्मण बींद कोय ।।

गुरू तरू शिष लागे सु यूं, ज्यों डाल पान फल फूल

बात घात इक झड़ पड़ै, एक छाडै मूल ।।

गुरू दादू रू कबीर की, काया भयी कपूर

जन रज्जब उनकी दया, पाई निश्चल ठौर।।

जन रज्जब राखे बिना, नाम राख्या जाय

जैसे दीपक जतन बिन, विसवाबीस बुझाय ।।

तन मन धक्का देत है, पुनि धक्का पंच भूत

रज्जब इनमे ठाहरै, सो आतम अबधूत ।।

सांई लग सेवा रची, टरया अपनी टेक

दादू सम नहिं दूसरा, दीरध दास सु एक ।।

Recitation

Speak Now