आदमी के लिए क़ुव्वत मुक़द्दम है, अगर क़ुव्वत जाती रही तो मुजाहिदा मुमकिन नहीं और माँ के दूध की क़ुव्वत चालीस साल तक रहती है, उसके बाद ग़िज़ा की क़ुव्वत है। मंशा यह है कि ‘‘जवानी को ग़नीमत जानो’’।
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अगर सब कुछ सिर्फ़ इल्म-ओ-इबादत पर मुन्हसिर होता, तो शैतान रांदा-ए-दरगाह न किया जाता, बल्कि सब कुछ इनायत-ए-इलाही पर मुन्हसिर है।
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बंदा रज़ा-ए-मौला के ख़िलाफ़ काम कर ही नहीं सकता।
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तवज्जोह इस का नाम है कि एक निगाह तमाम उम्र के लिए काफ़ी हो जाए।
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वज्द में आदमी बेहोश नहीं होता बल्कि बेख़ुद हो जाता है। अगर बेहोश हो गया, तो लुत्फ़ जाता रहता है।
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