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Sufinama
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Charandas Ji

1703 - 1839 | Mewar, India

Dohe of Charandas Ji

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माता सूं हरि सौ गुना जिन से सौ गुरूदेव

प्यार करैं औगुन हरैं चरनदास सुकदेव ।।

सतगुरू शब्दी सेल है सहै धमूका साध

कायर ऊपर जो चलै तौ जावै बरबाद ।।

जब सतगुरू किरपा करैं खोलि दिखावैं नैन

जग झूठा दीखन लगै देह परे की सैन ।।

गुरू के आगे जाय करि ऐसे बोलै बोल

कछू कपट राखै नहीं अरज करै मन खोल ।।

दया होय गुरूदेव की भजै मान अरू मैन

भोग वासना सब छुटै पावै अति ही चैन ।।

दृष्टि पड़ै गुरूदेव की देखत करें निहाल

औरैं मति पलटैं तवै कागा होत मराल ।।

इन्द्री मन के बस करै मन करै बुधि के संग

बुधि राखै हरि पद जहां लागै ध्यान अभंग ।।

पितु सूं माता सौगुना सुत को राखै प्यार

मन सेती सेवन करै तन सूं डांट उरू गार ।।

अपना करि सेवन करैं तीन भांति गुर देव

पंजा पच्छी कुंज मन कछुवा दृष्टि जु भेव ।।

ऐसी मारी खैंच कर लगी वार गइ पार

जिनका आपा ना रहा भये रूप ततसार ।।

सतगुरू के मारे मुए बहुरि उपजै आय

चौरासी बंधन छुटैं हरिपद पहुंचै जाय ।।

यह आपा तुम कूं दिया जित चाहौ तित राखि

चरनदास द्वारे परो भावै झिड़कौ लाखि ।।

जुदी जुदी पांचौ कहूं एक एक का भेद

जो कोइ इन कूं बस करै सबहीं छूटैं खेद ।।

सतगुरू मेरा सूरमा करै शब्द की चोट

मारै गोला प्रेम का ढहै भरम का कोट ।।

मुख सेती बोलन थका सुनै थका जो कान

पावन सूं फिरवा थका सतगुरू मारा बान ।।

सतगुरू शब्दी तीर है तन मन कीयो छेद

बेदरदी समझै नहीं बिरही पावै भेद ।।

इन्द्री मन मिलि होत है बिषय बासना चाह

उपजै जैसे काम हीं नारी मिलि अरू नाह ।।

जाति बरनकुल आस्रम मान बड़ाई खोय

जब सतगुरू के पग लगै सांच शिष्य ह्वै सोय ।।

हरि रूठैं कुछ डर नहीं तू भी दे छुटकाय

गुरू को राखौ सीस पर सब बिधि करैं सहाय ।।

सतगुरू ढूंढ़ा पाइये नहीं सुहेला होय

सिष भी पूरा कोइ हो सानी माटी जोय ।।

सतगुरू शब्दी तेग है लागत दो करि देहि

पीठ फेरि कायर भजै सूरा सनमुख लेहि ।।

दुर्जन के फूटे बिना तेरी होय जीत

चरनहिदास बिचारि करि ऐसी कहिये रीत ।।

अंडा जब आगे गिरै तब गुरू लेवैं सेई

करै बराबर आपनी सिख को निस्सन्देह ।।

जित जित इन्द्री जात है तित मन कूं ले जात

बुधि भी संगहि जात है यह निस्चय करि बात ।।

सतगुरू शब्दी मारिया पूरा आया वार

प्रेमी जूझै खेत में लगा राखा तार ।।

जित इन्द्री मन हूं गया रही कहां सूं बुध्दि

चरनदास यौं कहत हैं करि देखो तुम सुध्दि ।।

न्यारे न्यारे चहत है अपने अपने स्वाद

इन पांचौ में प्रीत है कछु बाद बिबाद ।।

जौ वे बिछुरैं घड़ी भी तौ गंदा होइ जाय

चरनदास यौं कहत हैं गुरू को राखि रिझाय ।।

चलौ करै थिर ना रहै कोटि जतन करि राख

यह जबहीं बस होयगा इन्द्रिन के रसनाख ।।

इन्द्री रोके ते रुकैं और जतन नहिं कोय

मन चंचल रिझवार है रसिक सवादी होय ।।

सतगुरू शब्दी लागिया नावक का सा तीर

कसकत है निकसत नहीं होत प्रेम की पीर ।।

शब्द बान मोहिं मारिया लगी कलेजे माहिं

मारि हँसे सुकदेव जी बाकी छोड़ी नाहिं ।।

इन्द्रिन सूं मन जुदा करि सुरति निरति करि सोध

उपजै ना बिष बासना चरनदास कर बोध ।।

कांचे भांडे सूं रहै ज्यों कुम्हार का नेह

भीतर सूं इच्छा करै बाहर चाटै देह ।।

मैं मिरगा गुरू पारघी शब्द लगायो बान

चरनदास घायल गिरे तन मन बीधे प्रान ।।

सतगुरू शब्दी बान है अँग अँग डारे तोड़

प्रेम खेत घायल गिरे टांका लगै जोड़ ।।

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