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Sufinama
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जमाल

1568 - 1593

जमाल

दोहा 86

जग सागर है अति गहर लहरि विषैं अति लाल

चढ़ि जिहाज़ अति नाम की उतरें पार 'जमाल'

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जोगिनि ह्वै सब जग फिरी कमरि बाँधि मृगछाल

बिछुरे साजन ना मिले कारन कौन 'जमाल'

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पिय फूले तैं हूँ हरी पिया हरैं हूँ डाल

पिया मो हु मो में पिया इक ह्वै रहे 'जमाल'

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बंसी बाजै लाल की गन गंधर्व बिहाल

ग्रह तजि तजि तहँ कुल वधु स्नवनन सुनत 'जमाल'

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राधे की बेसर बिचैं बनी अमोलक बाल

नन्दकुमार निरखत रहैं आठों पहर 'जमाल'

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