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Mahatma Kshemdasji (Niranjani)

Mahatma Kshemdasji (Niranjani)

Chaupai 3

 

Doha 7

अब कहूँ गोद कहूँ पालनै, कहूँ हासौ कहूँ रोज।।

गिरयो पडयो घुटने चल्यो, नहीं ग्यांन को खोज।।

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दस महीनां गर्भवास में, तहां रह्यौ मुख मूंदि।।

जहां तात मात की गम नहीं, वहां राखनहारा कौन।।

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नख चख सौंज बनाय करि, प्रभु आन्यो मुक्ती ठौर।।

निपजी में साझी घणा, धनी भए तब ओर।।

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पंचकै तन काहू रच्यो, बच्यो अगन मंझार।।

जब इनमें कहू कौन था, जो अब कहै हमार।।

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साबधान होय चुप रहे, चितयौ है चहुँ और।।

वाट वीचि ही ले गए, बसत साह की चोर।।

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